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Grih Pravesh by: Krishna Soni & Samvriddhi Kaushik

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गृह प्रवेश
काव्य संग्रह
संकलनकर्ता: कृष्ण सोनी एवं समृद्धि कौशिक

घर… आखिर घर क्या है?
क्या वह केवल चार दीवारें, एक छत, दरवाज़े और खिड़कियाँ हैं? या फिर वह उन रिश्तों, स्मृतियों, आवाज़ों, खुशबुओं और भावनाओं का नाम है, जो किसी स्थान को हमारे लिए अपना बना देती हैं?

‘गृह प्रवेश’ इसी प्रश्न के अनेक उत्तरों की तलाश करता एक संवेदनशील और बहुआयामी काव्य-संग्रह है। इस संग्रह में ‘घर’ केवल एक भौतिक स्थान नहीं, बल्कि प्रेम, स्मृति, परिवार, बचपन, अपनापन, विस्थापन, प्रतीक्षा, संघर्ष और लौटने की आकांक्षा का व्यापक मानवीय अनुभव बनकर सामने आता है। संकलनकर्ताओं ने विभिन्न कवियों की रचनाओं के माध्यम से घर की भारतीय अवधारणा का एक जीवंत साहित्यिक संसार रचा है।

इस संग्रह की कविताएँ घर को अलग-अलग दृष्टियों से देखती हैं। कहीं घर बचपन के आँगन में माँ की पुकार और पिता की छाया है, कहीं वह गाँव की मिट्टी और पुराने दिनों की स्मृति है। कहीं महानगर में रहने वाला व्यक्ति अपने छूटे हुए घर को याद करता है, तो कहीं किराए के छोटे से कमरे और अपने सपनों के घर के बीच का अंतर दिखाई देता है। कहीं वृद्ध माता-पिता की प्रतीक्षा है, तो कहीं खाली पड़े पुराने मकान की दीवारों में बीते जीवन की आवाज़ें अब भी सुनाई देती हैं।

इन कविताओं में संयुक्त परिवार की गर्माहट, त्योहारों की चहल-पहल, दादा-दादी और माता-पिता का स्नेह, भाई-बहनों की नोकझोंक और घर-आँगन की सहज खुशियाँ भी हैं। साथ ही आधुनिक जीवन की विडंबनाएँ भी हैं—शहरों की भागदौड़, रोजगार के कारण घर से दूर होना, बदलते परिवार, अकेलापन, विस्थापन और उस घर की तलाश जहाँ लौटने के लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं होती।

संग्रह की कई कविताएँ यह एहसास कराती हैं कि मकान और घर एक ही चीज़ नहीं हैं। दीवारें और छत मकान बना सकती हैं, लेकिन प्रेम, विश्वास, रिश्ते और स्मृतियाँ ही उसे घर बनाती हैं। घर माँ के हाथों की खुशबू हो सकता है, पिता की चिंता, भाई-बहन की हँसी, बच्चों की आवाज़, किसी पुराने पेड़ की छाया या बरसों बाद भी मन में जीवित कोई आँगन।

यह संग्रह घर को केवल निजी अनुभव के रूप में नहीं देखता, बल्कि उसे भारतीय समाज, संस्कृति और मानवीय संबंधों के व्यापक संदर्भ में रखता है। इसमें घर के साथ प्रकृति, गाँव, शहर, परिवार, पीढ़ियों और बदलते सामाजिक जीवन का संबंध भी दिखाई देता है।

‘गृह प्रवेश’ का प्रकाशन स्वयं एक नए घर में प्रवेश के अवसर से जुड़ा है। इसलिए यह पुस्तक केवल कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि एक नए जीवन, नए घर और नई स्मृतियों की साहित्यिक शुरुआत भी है।

यदि आपने कभी अपना घर छोड़ा है, किसी पुराने आँगन को याद किया है, माँ की आवाज़ को तरसा है, पिता की अनुपस्थिति महसूस की